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D K Singhal
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Recent updates: August 04, 2026
Added two thought provoking stories below-
भोजन में तेज़ मिर्च का डर
कटघरे से बाहर की सोच
Also available on the STRAY THOUGHTS page.
Article published in the Annual Technical Volume (Vol.7) of Production Engineering Division Board of IEI- The Institution of Engineers (India) Beyond Automation: Infusing Human Intelligence into Paper manufacturing
For a press part of paper machine, is a big, common vacuum pump better or individual vacuum pumps for different felts, uhle boxes? I have shared my views about these as well as some other related points in my recent article- My Observations about Press Part Vacuum System
कागज़ पर कवितायेँ तो बहुत लिखी गयी हैं, सदियों से लिखी जा रही हैं. लेकिन, कुछ थोड़ी सी ही कवितायें हैं, जिनमें कागज़ खुद उतर आया है. ऐसी ही कविताओं का संकलन आप देख सकते हैं, "PAPER IN POEMS" सेक्शन में. प्रस्तुत हैं, कुछ मेरी, कुछ अन्य विशिष्ट कवियों-साहित्यकारों की रचनायें कागज़ की महत्ता का वर्णन करने के लिए. Some more content added.
04.08.2026
भोजन में तेज़ मिर्च का डर
एक गाँव में सुबह सुबह ही झगड़ा शुरू हो गया.! बात मारपीट तक पहुँच गयी। ग्राम पंचायत वाले जुटे, बात बढ़ती देख किसी ने पुलिस बुला ली.
पुलिस ने पूछा तो ये पता चला कि लंगर का प्रोग्राम है.! और दाल में मिर्ची अधिक होने को लेकर झगड़ा हुआ है.. दरोगा जी ने कहा अच्छा लाओ हम भी चखें, दाल में मिर्ची कितनी तीखी है.. जो मारपीट पर उतर आये.
तो एक गाँव बाला बोला अभी बनी नहीं है.. लेकिन हमें पता है ये मिर्च तेज कर देंगे. कल का प्रोग्राम है.. और हमें तेज मिर्च पसंद नहीं है😁😁
अनेक उद्योगों में भी अक्सर ऐसा ही होता है. जब भी आप क्वालिटी इंप्रूवमेंट की बात करते हैं, या प्रोडक्शन बढ़ाना चाहते हैं; तो कुछ ना कुछ लोग, कुछ ना कुछ विचार ऐसे सामने जरूर आ जाते हैं, जो यह बताते हैं, "कि नहीं. प्रोडक्शन बढ़ाने पर या क्वालिटी बढ़ाने पर अमुक-अमुक समस्या आ सकती है."
मुझे ध्यान पड़ता है हमारे उद्योग में भी करीब 15-20 वर्ष पूर्व, 180 मीटर प्रति मिनट की स्पीड से कागज बना करता था. तब स्पीड बढ़ाने के नाम पर मेंटेनेंस से जुड़े लोगों का यह कहना था कि अगर स्पीड 200 मीटर प्रति मिनट तक जाती है, तब तो कोई बात नहीं, लेकिन इससे ऊपर जाने पर हमको बैरिंग बड़े साइज के लगाने पड़ेंगे. खैर धीरे-धीरे मशीन की स्पीड बढ़ाते गए; 200 मी प्रति मिनट पहुंचने पर यह कहा गया कि 225 मीटर प्रति मिनट के बाद तो निश्चित रूप से ही बेरिंग बड़े करने पड़ेंगे. फिर 250 मी प्रति मिनट और अंततः 280 मीटर प्रति मिनट की स्पीड से उन ही बैरिंग के साथ उस ही मशीन पर (स्वाभाविक रूप से कुछ अन्य तकनीकी एवं ऑपरेशनल मॉडिफिकेशन करके) सफलतापूर्वक कागज बनाया गया.
कुछ समय बाद एक अन्य उद्योग में जाना हुआ और वहां देखा कि हमारे जैसी ही एक मशीन 340 मीटर प्रति मिनट की स्पीड से हमारे जैसे ही बैरिंग के साथ चल रही थी. समस्या बेअरिंग के साथ नहीं थी, समस्या थी उस सोच की जो किसी भी व्यक्ति को उत्पादकता अथवा क्वालिटी बढ़ाने से रोकती है.
क्या आपके उद्योग में भी कर्मचारियों को "कल भोजन में मिर्च तेज़ हो जाएगी" का डर सताता है?
कटघरे से बाहर की सोच
एक चिड़ियाघर के एक बड़े घेरे में कंगारू, जिराफ और कुछ ऊंट वगैरा का झुंड रहता था. एक सवेरे चिड़िया घर के प्रबंधन कार्यकर्ता देखते हैं, कि कंगारू घेरे से निकलकर बाहर घूम रहा है. उसे पकड़कर अंदर किया और विचार किया कि घेरे को और ऊंचा किया जाए, ताकि वह कूद कर निकल ना सके. सभी जानते हैं कि कंगारू बहुत ऊंची छलांग लगा लेता है सो 10 मीटर घेरे को और ऊंचा किया गया. दूसरे दिन भी कंगारू घेरे के बाहर मस्ती से टहलता पाया गया. कटघरे को लोहे के जाल से 30 मीटर और ऊंचा किया गया. तीसरे दिन भी वही हाल.
प्रबंधन कमेटी सीरियसली मीटिंग करके घेरे को 100 मीटर ऊंचा किया। "देखें अब कैसे इतनी ऊंची छलांग लगाता है" और पूरा स्टाफ चैन की नींद सो गया. उधर जिराफ और ऊंट, कंगारू से बातें कर रहे थे, "आओ बाजी लगाते हैं कि अगले दिन यह सब घेरे को कितना ऊंचा करते हैं." कंगारू बोला- "कितना भी ऊंचा करें, लेकिन ऐसे ही छोटा फाटक खोले रखेंगे तो मैं आराम से बाहर टहलने निकल जाया करूंगा".
हर समस्या का एक मूल कारण होता है. उसे पारखी नजर और दूरगामी दिमाग से ढूंढना पड़ता है. मान लीजिए, किसी व्यक्ति को बुखार आ गया, तो वह बुखार की गोली लेकर ठीक हो जाएगा. लेकिन अगर किसी व्यक्ति के पैर में फोड़ा है और उस फोड़े के पकने के कारण बुखार आया है, तो बुखार की कितनी भी दवाइयां देते रहें, बुखार ठीक नहीं होगा. सबसे पहले उसके पैर का इलाज करना पड़ेगा. इसी प्रकार, छोटे फाटक को भूलवश खुला रखना मूल समस्या है.
क्या आप किसी बड़ी समस्या आने पर कटघरे से बाहर निकल कर सोचते हैं?
For Kids:
Long back, probably in 2014, I prepared two presentations for higher secondary class students. Sharing these here-
How to Excel in Competitive Examinations
Some paper related interesting stuff is available in the PAPER page also.
28.05.2026
माननीय प्रधानमंत्री श्री मोदीजी के वोकल फॉर लोकल सन्देश के लिए, छोटे बच्चों की तरफ से एक कविता.
मम्मी मेरे लिए ढूँढ दो दुल्हन
उसके संग प्ले स्कूल जाऊँगा....
कृपया STRAY THOUGHTS पेज पर देखिये.
About Me...
D K Singhal is B.E., M.E. (Pulp & Paper, 1993) from Deptt. of Paper Technology, University of Roorkee (now IIT, Roorkee). Also Certified Energy Auditor, 2004 with Bureau of Energy Efficiency. In addition to practical experience in papermaking, project planning, research and development, consultancy, automation etc.; energy conservation, environment and cost reduction are the main areas of concern.
With more than 150 publications, emphasized on development of low cost technologies and management practices for quality and profitability improvement constantly sharing knowledge and experience with others. Also written a book Gathering the Rolling Experiences having many management case studies related to pulp & Paper. The book has been published by Rigi Publication, Khanna. The soft copy of the book is also available in the Paper section of this website. Some of the publications can also be seen at ippta.co and paperonweb.com.
B.E. (Pulp & Paper), 1990, IIT Roorkee
M.E. (Pulp & Paper), 1993, IIT Roorkee
Certified Energy Auditor, Bureau of Energy Efficiency
Chartered Engineer, Institution of Engineers
Memberships:
Life Member, Member of Editorial Board, IPPTA (Indian Pulp & Paper Technical Association)
Life Member, SEEM (Society of Energy Engineers and Managers)
Member, IAEMP (Indian Association Energy Management Professionals)
Fellow Member, IEI (Institution of Engineers)
Life Member, Quality Circle Forum of India
Life Member, ISIAM (Indian Society of Industrial and Applied Mathermatics)
Member, CHD-15, BIS (Bureau of Indian Standards)